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Showing posts from 2009

जिंदगी के सबसे अच्छे दिन ......

अगर कोई मुझ से पूछे जिन्दगी के सबसे अच्छे दिन के बारे में तो मैं बिना वक़्त लिए कह दूंगा वो स्कूल के दिन , वो कॉलेज के दिन । स्कूल के दिनों में तो कुछ पाबन्दी भी होती थी लेकिन फिर भी उन दिनों को भुलाया नहीं जा सकता । दोस्तों के साथ मस्ती करना ,उनसे लड़ना, टीचरों का डांट सुनना उसके बाद भी सरारत करना इन दिनों को याद करके फिर से स्कूल जाने का मन करता है । कॉलेज के दिनों की तो बात ही कुछ और थी यहाँ तो किसी चीज की पाबन्दी ही नहीं ....अपने मन की सुनो और जो मन में आये वो करो मेरी जिंदगी की सबसे यादगार दिनों में है कॉलेज का दिन २०-२५ लडको का ग्रुप होता था और खूब मस्ती करते थे हम लोग। चुनाव के दिनों में नेतागिरी होती थी। फेस्ट में खूब नाचते थे डीजे पर । और पेपर के दिनों में पढने की याद आती थी । फुल मस्ती करते थे । नए सत्र के शुरुआत के समय तो नए छात्रों के साथ खूब मजे करते थे । अब प्रश्न ये उठता है की इन दिनों की याद क्यों आई ..बिना दुख आये सुख वाले दिन याद नहीं किये जाते। अब मैं रोज़गार में लगा हूँ तो पता चला है की नौकरी क्या चीज होती है कितना भी अच्छा कर लो जब तक बॉस खुश नहीं काम करने का कोई फ़ा...

हिन्दी पर हमला....

महाराष्ट्र विधानसभा में हुई घटना क्षमा योग्य नहीं है. राष्ट्र भाषा का अपमान करने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए की पहले हम भारतीय है और हिंदी हमारी मात् भाषा है उसके बाद हमारे लिए कोई राज्य अहमियत रखता है . ऐसे लोगो को कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए . ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओ पर हमारे देश के प्रधानमंत्री को सोचना चाहिए की ऐसे देशद्रोहियों से कैसे निपटा जाए ?

कुछ यादें जो प्रेरणा देती है............

अगर दिल में हो कुछ कर दिखाने का उमंग और उसको पुरा करने का जज्बा, तो रास्ते में आने वाली कठिनाइया भी अपना रुख बदल लेती है । मुझे अपने स्कूल के दिनों में एक ऐसे अध्यापक से पढने का मौका मिला जिनका जीवन निश्चय ही प्रेरणा दायक है । इनका नाम राजेंद्र दास है । ये अपनी आँखों से देख नही सकते, फिर भी एक देखने वाले व्यक्ति से अधिक कार्य करते हैं । इनकी स्मरण शक्ति ऐसी है जिसे एक बार सुन लिया उसके बाद तो भूलने का नाम ही नहीं लेते । जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में था उस समय वो मुझे हिन्दी अध्यापक के रूप में मिले । वे हिन्दी के बहुत ही अच्छे अध्यापक है । विद्यार्थियों को हिन्दी में आए कठिनाइयों को सरलतम तरीके से समझाते हैं ऐसा लगता है जैसे इन्हे सारा अध्याय कंठस्थ हो । एक बार किसी विद्यार्थी का नाम सुन लेते हैं उसके बाद तो उसकी आवाज से ही पहचान लिया करते हैं। इनके कक्षा का परिणाम हमेशा शत प्रतिशत रहा है । इनकी लगन और कार्य को देखकर सरकार ने इन्हे पदोन्नति पत्र भेजा और ये एक अध्यापक से उप- प्रधानाध्यापक के रूप में दूसरे स्कूल में नियुक्त किए गए । लेकिन जब इनका नियुक्ति पत्र आया उस समय 11 वीं और 12 वीं का ...

जिंदा है इंसानियत

कुछ समय पहले की बात है, जब मैं अपने एक मित्र के साथ साउथ एक्स फ्लाई ओवर के नीचे से डीफेंस कालोनी की ओर जा रहे रास्ते से गुजर रहा था। हम दोनों आपस में बात करते हुए जा रहे थे की अचानक हम ने देखा एक साईकिल सवार व्यक्ति जो की दुर्घटना ग्रस्त हो गया था और उसकी साईकिल भी पूर्ण रूप से टूट गई थी। पास में ही ट्रैफिक पुलिस के नौजवान भी खड़े थे , लेकिन उनके पास इस दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की सुध लेने का वक्त नही था। यह दुर्घटना इतनी तीव्र गति से घटी की हम यह नही जान सके की इस व्यक्ति को कौन ठोकर मार कर भागा है । तुंरत ही हम दोनों उसके पास गए और उस व्यक्ति को उठाया साथ ही साईकिल को सड़क के किनारे रख दिया । उस व्यक्ति को अधिक चोट तो नही लगी लेकिन उसकी साईकिल पूर्ण रूप से टूट गई थी । इतने में ही दूसरी छोर के रेड लाइट पर रुकी कार से एक नौजवान उतर कर आया और उसने अपनी जेब से पाँच सौ रुपए का नोट निकालते हुए उस व्यक्ति से पूछा , कही चोट तो नही लगी। ये पैसे रख लो अपनी साईकिल ठीक करवा लेना । यह कहकर अपनी गाड़ी में बैठ गया । इतने में रेड लाइट भी ग्रीन हो गई और वह व्यक्ति चला गया । आज भी जब कभी मैं उस रास्ते ...

झंझारपुर कमला ब्रिज

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ये इंडिया का एक ऐसा ब्रिज है जिस पर ट्रेन बस और यातायात का अन्य साधन एक साथ चलता हैं । ये बिहार के मधुबनी डिस्ट्रिक्ट के झंझारपुर स्थित कमला नदी पर बना है । रोज कई ट्रेन और हजारो वाहन इस पर होकर गुजरता है । वहां की जनता के लिए ये ब्रिज अहम् भूमिका निभाती है । आज कल इस ब्रिज की सुध लेने वाला कोई नही है । इस की स्तिथि काफी जर्जर हो गई है । जिसकी ख़बर न तो प्रशासन को है और न ही बिहार सरकार को ।

आख़िर विश्वविद्यालय प्रशासन की नींद खुल ही गई ..

दिल्ली विश्वविद्यालय में चुनावी घमासान पर काबू पाने और आचार संहिता के उल्लंघन को रोकने के लिए , विश्विद्यालय प्रशासन ने जो कदम उठाया है वो वाकई प्रशंसनिए है , लेकिन सवाल ये उठता है की ऐसे कदम प्रशासन ने उस समय क्यों उठाया जब छात्र संगठनो ने उम्मीदवारी तय कर दी थी , ये कदम उम्मीदवारी तय करने से पहले भी की जा सकती थी । इस से पहले भी कई बार आचार संहिता का उलंघन हुआ है लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा कोई कदम नही उठाया गया । ऐसे में अब छात्र नेताओ और संगठनों में रोष होना भी स्वाभाविक है .....

नया सत्र, नई डगर ......

यूँ तो देल्ही यूनिवेर्सिटी का मौसम हमेशा खुशगवार होता है लेकिन जब बात नए सत्र के आरम्भ का हो तो दिल खुशी से कह उठता है ऐसी आज़ादी और कहा ! नया सत्र प्रारम्भ होने के साथ नए नए चेहरे दिखने लग जाते है। कई आँखों में कुछ कर दिखाने का सपना होता है तो कई यूवा यहाँ आकर सपना संजोते हैं । जब बात डी यू की हो तो यहाँ होने वाले छात्र चुनाव को कैसे भूला जा सकता है चुनाव के मौसम में तो यहाँ का नज़ारा ही कुछ और होता है । चुनाव के मौसम में सभी छात्र नेता अपने प्रचार में जुट जाते है तथा अपने धन बल का प्रोयोग भी जी भर के करते है । कुछ कर दिखाना का जज्बा भी इस कदर इन पर हावी होता है की सही और ग़लत को समझना इनके लिए मुश्किल हो जाता है । इन सब के अलावा कुछ ऐसे छात्र भी यहाँ होते है जिन्हें इस रंगीन दुनिया से कोई मतलब नही होता जो सिर्फ और सिर्फ़ पढाई में मग्न रहते है । बात जब डीयू की हो तो सीनियर छात्रो को कैसे भूला जा सकता है जो नए छात्रों के साथ मिल कर एन्जॉय तो करते ही है साथ ही साथ उन्हें सही मार्ग दर्शन भी देते है और समय समय उनकी मदद करते है । कॉलेज जीवन एक ऐसा सफर होता है जहा हमेशा भटकने का डर रहता है , ...

जाति क्यों नही जाती

अक्सर हम बात करते है की जातिवाद का अंत होना चाहिए...जाति प्रथा समाज के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है...फिर देखने को मिलता है जाति के आधार पर आरक्षण । क्या ये जाति प्रथा को बढावा नही देती ? हमारे नेता वोट बैंक बनाने के लिए जाति को आधार बनाकर कई तरह का खेल हमारे साथ खेलते है..... वर्तमान में हो रहे आम चुनाव की बात करे तो आलम ये है किस जाति को टिकट दिया किस को नही इस पर भी बहस छिड गई है सवाल ये है की जाति का अंत तब तक सम्भव नही है जब तक की हमारे नेता जातिगत वोट की राजनीती बंद न करे । जाति से उठकर विकास की बात करना हमारे नेता भूल गए है उन्हें मतलब है अपनी बिरादरी से अपने कुनवे से । ऐसे में जाति का जाना असंभव है .......

भारत को मिला तूफ़ान ...

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इरफान पठान तू है देश की शान , भारतीय क्रिकेट को दी तुने नई पहचान । इस देश को मिला एक तूफ़ान हर मुश्किल में बचाई देश की शान , वीर खिलाड़ी भी है तुझसे परेशान । जब हुआ तेरा चयन , लोगो ने सोचा मन ही मन , तू है कुछ दिन का मेहमान । लेकिन तू ने अपनी क्षमता से, सबको दिया प्रमाण। तू है महान और इस देश की शान । गेंद से ही नही बल्ले से भी , तुने किया है विपक्षी को हैरान , तुमसे लोगो को आशा है , और मेरी यह अभिलाषा है, जिस दिन तुम बनोगे कप्तान , मेरी इस कविता का होगा सम्मान । यह कविता मैंने 2004 में लिखा था जब इरफान पठान क्रिकेट में अच्छी स्तिथि में नही थे..और टीम से बाहर कर दिए गए थे । उसके कुछ दिनों बाद उन्होंने साबित कर दिया की क्रिकेट में उनकी अलग पहचान है ।

आज की राजनीतिक परिस्थिति ...........

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आज के नेता

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चुनाव का मौसम आया , नेताओ का मन घबराया । शुरू हुई चुनाव प्रक्रिया , समर्थन लेकर पहुंचे नेता । पैसे देकर ख़रीदा सीट , पार्टी का दिल लिया जीत । फिर बनठन कर चले जनता के पास, उनसे मिली इन्हे वोटों की आश । बढे आगे हर्षो उल्लास, बीच में हुआ विरोधी का आभास, नेताजी पहुचे फ़ौरन पास । आपस में हुई खीचा तानी , नेताजी ने शुरू की अपनी कहानी । एक मौका और दी जिए, सब्र से काम लीजिये । हर घर में होगी बिजली- पानी , कभी न होगी बेईमानी । लोगों का दिल जीत कर , विरोधी को भारी वोटों से पीट कर, नेताजी ने किया शपथ ग्रहण । कुर्सी पर बैठते ही डोला उनका मन , यह मौका है आखिरी , करलूं घोटालों का शुभारम्भ । एक बार फिर लोगों को , न मिला अन्न , न मिला पानी , मिली तो सिर्फ़ बेईमानी ।

ताकि नींद खुल सके ....

रैगिंग एक ऐसी समस्या है जिसका निदान ढूँढना परम आवश्यक हो गया है।   रैगिंग को रोकने के लिए कई कानून बनाये गए लकिन वे सभी कानून इस पर काबू पाने में असफल साबित हुए।  इसलिए सरकार को चाहिए की सख्ती बरतते हुए इसमें लिप्त संस्थाओं की मान्यता तत्काल रद्द कर दी जाये जिससे इन संस्थाओं की नींद खुल सके। गंगेश कुमार