कुछ यादें जो प्रेरणा देती है............
अगर दिल में हो कुछ कर दिखाने का उमंग और उसको पुरा करने का जज्बा, तो रास्ते में आने वाली कठिनाइया भी अपना रुख बदल लेती है । मुझे अपने स्कूल के दिनों में एक ऐसे अध्यापक से पढने का मौका मिला जिनका जीवन निश्चय ही प्रेरणा दायक है । इनका नाम राजेंद्र दास है । ये अपनी आँखों से देख नही सकते, फिर भी एक देखने वाले व्यक्ति से अधिक कार्य करते हैं । इनकी स्मरण शक्ति ऐसी है जिसे एक बार सुन लिया उसके बाद तो भूलने का नाम ही नहीं लेते । जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में था उस समय वो मुझे हिन्दी अध्यापक के रूप में मिले । वे हिन्दी के बहुत ही अच्छे अध्यापक है । विद्यार्थियों को हिन्दी में आए कठिनाइयों को सरलतम तरीके से समझाते हैं ऐसा लगता है जैसे इन्हे सारा अध्याय कंठस्थ हो । एक बार किसी विद्यार्थी का नाम सुन लेते हैं उसके बाद तो उसकी आवाज से ही पहचान लिया करते हैं। इनके कक्षा का परिणाम हमेशा शत प्रतिशत रहा है ।
इनकी लगन और कार्य को देखकर सरकार ने इन्हे पदोन्नति पत्र भेजा और ये एक अध्यापक से उप- प्रधानाध्यापक के रूप में दूसरे स्कूल में नियुक्त किए गए । लेकिन जब इनका नियुक्ति पत्र आया उस समय 11 वीं और 12 वीं का परीक्षा नजदीक था इसलिए वे विद्यार्थियों को छोड़कर नही गए परीक्षा के उपरान्त उन्हों ने पद ग्रहण किया । जब वो विद्यालय छोड़ कर जा रहे थे उस समय ऐसा लगा जैसे उनसे फ़िर मुलाकात न हो सकेगी लेकिन कुछ ही महीनों बाद मैंने उन्हें अपने विद्यालय के उप -प्रधानाध्यापक की कुसी पर बैठे देखा, उनसे पूछने पर पता चला कि वे हमारे ही विद्यालय में आ गए हैं । पहले जिस विद्यालय में वे अध्यापक थे अब वे उप- प्रधानाध्यापक के रूप अपना कार्य संभाल रहे हैं ।
वैसे तो इनके जीवन के बारे में मुझे कुछ पता नही लेकिन इनकी मात्र दो वर्ष कि तरक्की को देखकर ऐसा लगा कि इनका जीवन निश्चय ही प्रेरणादायक है । नेत्र न होने के वाबजूद इन्होने कड़ी मेहनत और त्याग के बलबूते अपने जीवन को सफल बनाया ।
इनकी लगन और कार्य को देखकर सरकार ने इन्हे पदोन्नति पत्र भेजा और ये एक अध्यापक से उप- प्रधानाध्यापक के रूप में दूसरे स्कूल में नियुक्त किए गए । लेकिन जब इनका नियुक्ति पत्र आया उस समय 11 वीं और 12 वीं का परीक्षा नजदीक था इसलिए वे विद्यार्थियों को छोड़कर नही गए परीक्षा के उपरान्त उन्हों ने पद ग्रहण किया । जब वो विद्यालय छोड़ कर जा रहे थे उस समय ऐसा लगा जैसे उनसे फ़िर मुलाकात न हो सकेगी लेकिन कुछ ही महीनों बाद मैंने उन्हें अपने विद्यालय के उप -प्रधानाध्यापक की कुसी पर बैठे देखा, उनसे पूछने पर पता चला कि वे हमारे ही विद्यालय में आ गए हैं । पहले जिस विद्यालय में वे अध्यापक थे अब वे उप- प्रधानाध्यापक के रूप अपना कार्य संभाल रहे हैं ।
वैसे तो इनके जीवन के बारे में मुझे कुछ पता नही लेकिन इनकी मात्र दो वर्ष कि तरक्की को देखकर ऐसा लगा कि इनका जीवन निश्चय ही प्रेरणादायक है । नेत्र न होने के वाबजूद इन्होने कड़ी मेहनत और त्याग के बलबूते अपने जीवन को सफल बनाया ।
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